Thursday, 25 September 2014

छोटा, बहुत छोटा (मधुदीप की लघुकथा)


              छोटा, बहुत छोटा  (मधुदीप की लघुकथा)
एक सम्भ्रान्त-सी कॉलोनी में बनी रामनिवास मिश्र की छोटी-सी कोठी का आज गृह-प्रवेश है |
     रामनिवास मिश्र ने गरीब परिवार में जन्म अवश्य लिया था मगर उसमें उससे सतत संघर्ष का माद्दा भी था | दसवीं की परीक्षा पास करते ही उसने कारखाने में काम करना शुरू कर दिया था ताकि शाम के कॉलिज में अपनी पढाई जारी रख सके | जिस दिन वह भारत सरकार के एक कार्यालय में तृतीय श्रेणी का लिपिक बनकर पहुँचा, उसका सिर ऊँचा था |
     अपने छत्तीस साल के सेवाकाल में वह लिपिक से अनुभाग अधिकारी के पद तक तो अवश्य पहुँच गया था मगर एक कसक हमेशा उसके मन में बनी रही थी | काश ! वह ढंग की कॉलोनी में अपना एक छोटा-सा आशियाना बना सके | जिस निम्न मध्यम वर्ग इलाके में उसका ठिकाना था, उससे वह कभी सन्तुष्ट नहीं रहा | इसे उसका भाग्य ही कहें, उसे अपने सेवाकाल में ही एक सौ बीस मीटर जमीन का टुकड़ा नगर विकास प्राधिकरण के ड्रा में मिल गया था | बस, सेवानिवृत्त होते ही मिले पैसे से उसने उस पर अपने सपनों का महल बना लिया |
     आज गर्व और सन्तोष से रामनिवास मिश्र की गर्दन थोड़ी ऊँची है | गृह-प्रवेश के समारोह में उसने अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ ही आस-पड़ोस से सभी को बुलाया है |
     दोपहर ढल रही है...दो बज रहे हैं | शामियाने में गहमागहमी है |
     “मिश्राजी, आपने कोठी में कार पार्किंग नहीं बनवाई ?” पड़ोसी सहगल साहब ने लिफाफा देते हुए कोल्ड ड्रिंक का गिलास हाथ में थाम लिया |
     “सहगल भाई, जब अपने पास कार ही नहीं है तो फिर कार पार्किंग का क्या करना है !” मिश्र  ने सहजता से कहा |
    “क्या...?” सहगल साहब चौंके तो उनके हाथ की कोल्ड ड्रिंक मिश्र के कपड़ों पर छलक गई |
     मिश्र को महसूस हो रहा है, वह छोटा, बहुत छोटा हो गया है |  ०००


विषपायी (मधुदीप की लघुकथा)

       विषपायी    (मधुदीप की लघुकथा)
बात उन दिनों की है जब ‘लव जिहाद’ शब्द पूरी तीव्रता से देश की हवाओं में फैल रहा था | हाँ, यह बात और है कि देश का गृहमन्त्री इस शब्द से बिलकुल अनभिज्ञ था |
     रामचन्द्र शर्मा के घर की बैठक में उनका पूरा परिवार एकत्रित था | आसन्न संकट से वहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था | निखिल और जुबैदा सब के सामने सिर झुकाए बैठे थे |
     “मैं निखिल को दिल की गहराइयों से प्यार करती हूँ |” जुबैदा की जुबान खुली तो सन्नाटा और अधिक गहरा गया |
     “मैं जानता हूँ ,बेटी !” रामचन्द्र की निगाहें खिड़की से बाहर झाँक रही थीं |
     “मैं इसके लिए अपना धर्म भी बदलने को तैयार हूँ |” जुबैदा के शब्दों में थोड़ी मजबूती थी |
     “हिन्दू धर्म इसकी इजाजत ही नहीं देता, बेटी !” रामचन्द की आवाज बुझी हुई थी |
     “तो मैं अपना धर्म बदल लेता हूँ |” निखिल की आवाज पर सब की निगाहें उधर ही खिंच गई थीं |
     “नहीं निखिल, यह नहीं हो सकता |” जुबैदा प्रतिवाद कर उठी |
     “क्यों नहीं हो सकता ?” निखिल ने प्रश्न उठाया |
     “धर्म के ठेकेदारों के लिए तो यह ‘लव जिहाद’ होगा ना, चाहे दूसरी तरह का ही क्यों न हो |”
     जुबैदा के शब्दों की दृढता ने रामचन्द्र के साथ ही वहाँ उपस्थित सभी को चौंका दिया |
     “तो फिर...?” रामचन्द्र और निखिल दोनों की प्रश्नभरी दृष्टि एक साथ जुबैदा के चेहरे पर टिक गईं |
      थोड़ी देर तक चुप्पी छाई रही | प्रश्न यूँ ही हवा में टँगा रहा |
     “हमें थोड़ा इन्तजार करना होगा, निखिल |”
     “कब तक...?”
     “इस जहरभरी आँधी के उतरने तक...ठण्डी बयार के आने तक |”
     “क्या यह कभी होगा ?...क्या इस जहर को पीने के लिए कोई नीलकण्ठ आयेगा ?” निखिल की दृष्टि सामने की दीवार पर लगे कैलेण्डर पर टिक गई थी |
     “नहीं निखिल, कोई नीलकण्ठ नहीं आयेगा | हमें खुद ही अपना नीलकण्ठ बनना होगा | हमें खुद ही यह जहर पीना होगा | न केवल पीना होगा, पचाना भी होगा | विश्वास रखो, यह जहर ही हमारे लिए अमृत बनेगा |”
     कहकर जुबैदा तेजी से उठी और मजबूत कदमों से दरवाजे से बाहर निकल गई | रामचन्द्र और निखिल दोनों की निगाहें उसकी पीठ से चिपककर रह गई थीं |   ०००