छोटा, बहुत छोटा (मधुदीप की लघुकथा)
एक सम्भ्रान्त-सी कॉलोनी में बनी रामनिवास
मिश्र की छोटी-सी कोठी का आज गृह-प्रवेश है |
रामनिवास मिश्र ने गरीब परिवार में जन्म अवश्य लिया था मगर उसमें उससे सतत
संघर्ष का माद्दा भी था | दसवीं की परीक्षा पास करते ही उसने कारखाने में काम करना
शुरू कर दिया था ताकि शाम के कॉलिज में अपनी पढाई जारी रख सके | जिस दिन वह भारत
सरकार के एक कार्यालय में तृतीय श्रेणी का लिपिक बनकर पहुँचा, उसका सिर ऊँचा था |
अपने छत्तीस साल के सेवाकाल में वह लिपिक से अनुभाग अधिकारी के पद तक तो
अवश्य पहुँच गया था मगर एक कसक हमेशा उसके मन में बनी रही थी | काश ! वह ढंग की
कॉलोनी में अपना एक छोटा-सा आशियाना बना सके | जिस निम्न मध्यम वर्ग इलाके में
उसका ठिकाना था, उससे वह कभी सन्तुष्ट नहीं रहा | इसे उसका भाग्य ही कहें, उसे
अपने सेवाकाल में ही एक सौ बीस मीटर जमीन का टुकड़ा नगर विकास प्राधिकरण के ड्रा
में मिल गया था | बस, सेवानिवृत्त होते ही मिले पैसे से उसने उस पर अपने सपनों का
महल बना लिया |
आज गर्व और सन्तोष से रामनिवास मिश्र की गर्दन थोड़ी ऊँची है | गृह-प्रवेश
के समारोह में उसने अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ ही आस-पड़ोस से सभी को बुलाया है |
दोपहर ढल रही है...दो बज रहे हैं | शामियाने में गहमागहमी है |
“मिश्राजी, आपने कोठी में कार पार्किंग नहीं बनवाई ?” पड़ोसी सहगल साहब ने
लिफाफा देते हुए कोल्ड ड्रिंक का गिलास हाथ में थाम लिया |
“सहगल भाई, जब अपने पास कार ही नहीं है तो फिर कार पार्किंग का क्या करना
है !” मिश्र ने सहजता से कहा |
“क्या...?” सहगल साहब चौंके तो उनके हाथ की कोल्ड ड्रिंक मिश्र के कपड़ों पर
छलक गई |
मिश्र को महसूस हो रहा है, वह छोटा, बहुत छोटा हो गया है | ०००