Wednesday, 27 August 2014


                     ठक-ठक...ठक-ठक  (मधुदीप की लघुकथा)

जेठ की तपती सुबह है | अभी दस ही बजे हैं मगर लूएँ चल रही हैं | भुवनेश्वर दत्त झुंझला रहे हैं, ‘इतना समय भी नहीं मिल पाता कि कार का एयर-कंडीशन ही ठीक करवा लें |  भागदौड़...दौडभाग... भागदौड़... प्रकाशन का भी यह कैसा व्यवसाय है कि इतनी भागदौड़ के बाद भी ठीक-सा जुगाड़ नहीं हो पाता |’
     लालबत्ती पर कार रुक गई है | भुवनेश्वर दत्त की झुंझलाहट और बढ़ रही है | यह लाल बत्ती... उफ...कितनी लम्बी...तीन मिनट की...वे बेचैन हो उठे हैं |
     “बाबूजी ! बाल पैन...दस रुपये के चार...लेलो बाबूजी...”फटी फ्राक पहने, एक दस साल की बच्ची कार की खुली खिड़की पर ठक-ठक कर रही है |
     “क्या करूँगा इनका...!” वे मुँह दूसरी तरफ घुमा लेते हैं |
     “लेलो बाबूजी...रोटी खा लूँगी...भूख लगी है...” खिड़की पर ठक-ठक बढ़ रही है |
     “ओह ! भीख माँगने का नया तरीका...!” वे व्यंग्य से मुस्कराते हैं | हरी बत्ती होते ही कार आगे बढ़ जाती है |
     मुस्कराहट में भुवनेश्वर दत्त की झुंझलाहट डूब गई तो उन्होंने कार की स्पीड बढ़ा दी, ‘साढ़े दस बज रहे हैं...सिन्हा साहब ने तो दस बजे ही मिलने को कहा था...कहीं निकल न जायें ... आज उनसे बात पक्की कर ही लेनी है...चाहे कुछ भी माँगें...इस बार भरपूर आदेश चाहिए उन्हें...’
     कार चीं...की आवाज के साथ सिन्हा साहब की कोठी के सामने रुकी |  सिन्हा साहब बाहर लॉन में ही कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे | देखकर भुवनेश्वर दत्त को तसल्ली हुई |
     “सिन्हा साहब, नमस्कार !”
     उत्तर में सिन्हा साहब ने अखबार सामने रखी मेज पर दिया तथा उँगली से भुवनेश्वर दत्त को पास पड़ी कुर्सी पर बैठने का संकेत किया |
     “सर ! इस बार आपकी विशेष कृपा चाहिए |” चुप्पी को तोड़ते हुए भुवनेश्वर दत्त ने कहा |
     सिन्हा साहब की प्रश्नभरी दृष्टि उनकी ओर उठी |
     “सर ! इस बार बिटिया की शादी तय हो गई है |”

     “बहुत खूब भुवनेश्वरजी ! सब यही कह रहे हैं...क्या यह कोई नया तरीका है...?
     सुनकर भुवनेश्वर दत्त सन्न रह गए हैं |
     ठक-ठक...ठक-ठक...कार लालबत्ती पर खड़ी है...खिड़की पर लगातार ठक-ठक हो रही है | ०००
                                                          
                                                                     ---- मधुदीप
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Sunday, 24 August 2014


     मेरा बयान    (मधुदीप की लघुकथा) 
वह कहता है कि मैं मर चुकी हूँ मगर मुझे पूरा विश्वास है कि मैं जिन्दा हूँ और अपने पूरे होशो-हवास में यह सब बयान कर रही हूँ | इस बात को लेकर हम दोनों के बीच रात ही अबोला खिंच गया था |
     अगर मैं मर चुकी होती तो इस समय आपसे रू-ब-रू कैसे होती ? क्या मरा हुआ व्यक्ति किसी से सम्वाद कर सकता है ? अगर मैं कहूँ कि मैं नहीं, वह मर चुका है, तो क्या वह इसे स्वीकार कर लेगा ?
     यह सच है कि गहराती रात में उन चार भेड़ियों ने मेरी देह नोची है मगर इससे मैं यह कैसे मान लूँ कि मैं मर चुकी हूँ ! मैं जिन्दा हूँ, यह सौ प्रतिशत सच है और इसका प्रमाण है कि मैं इस घटना की पूरी रपट थाने में लिखवाकर आई हूँ और सुबह फिर इस सन्दर्भ में मुझे पुलिस थाने जाना है |
     “तुम्हें क्या जरूरत थी पुलिस थाने जाने की और इस सब की रिपोर्ट लिखवाने की !” रात को सब-कुछ जानने के बाद उसकी यही प्रतिक्रिया थी |
     “तो क्या मुझे इसके बाद चुप बैठ जाना चाहिए था ?” मुझे लग रहा था कि मेरी पीठ पर एक कीड़ा रेंग रहा है | मैं हाथ पीछे कर उसे हटाना चाह रही थी मगर मेरा हाथ वहाँ तक पहुँच ही नहीं पा रहा था |
     “अब इससे कुछ हासिल होगा ?” एक प्रश्न उछला था उस ओर से |
     “क्यों नहीं...?”
     “इस घटना के बाद तुम मर चुकी हो और मुर्दों को कुछ हासिल नहीं हुआ करता |”
     “यह झूठ है, सरासर झूठ | मैं जिन्दा हूँ...सौ प्रतिशत ! और जिन्दा लोग लड़ाई से भागा नहीं करते |”
     उसके पास इसका शायद कोई जवाब नहीं था | वह मुँह फिराकर पसर गया था |

     मैं कुर्सी में धँसी अपने जिन्दा होने का प्रमाण ढूँढ रही हूँ क्योंकि उस प्रमाण के साथ मुझे सुबह होते ही पुलिस थाने जाना है |   ००० 

Wednesday, 20 August 2014

हाँ, मैं जीतना चाहता हूँ / मधुदीप

मधुदीप
‘आओ, जिन्दगी से कुछ बातें करें !’ हाँ, अनुपम खेर ने एक टीवी विज्ञापन में यही तो कहा था |
     वह भी पिछले साठ साल से अपनी जिन्दगी से बातें करता रहा है मगर जिन्दगी ने जैसे उसकी बातें कभी सुनी ही नहीं |
     उसने अपने बचपन से बातें की थीं | सफेद कमीज और पतलून पहनकर क्रिकेट का बल्ला घुमाने की बातें मगर जिन्दगी ने उसकी बातें सुनने की बजाय उसके पिता की बातें सुनीं और उसे फुटबाल का खिलाड़ी बना दिया | हासिल रहा शून्य |
     बचपन से युवावस्था आने तक वह अपनी जिन्दगी से फुसफुसाहटों में बातें करता रहा | यह जिन्दगी से सपनों की बातें करने का समय था | उसने जिन्दगी से प्राध्यापक बनने के सपने की बात की मगर यहाँ भी जिन्दगी ने उसकी बजाय नियति की बातें सुनी | पिता के अचानक अवसान के कारण वह भारत सरकार में एक अदना-सा लिपिक बनकर रह गया |
     उसके बाद अब तक वह जिन्दगी से बतियाने और उसे अपनी सुनाने का भरसक प्रयास करता रहा मगर जिन्दगी ने जिस अन्धी दौड़ में उसे धकेल दिया था उसमें उसे ठहरकर इत्मीनान से बातें करने का मौका ही नहीं मिला | घर,परिवार,बच्चे और उन सबका दायित्व...वह जिन्दगी से कब अपने मन की बात कह सका ! कब अपनी बात उससे मनवा सका ! वह बस हारता ही तो रहा |
     आज वह सेवा-निवृत्त हो रहा है | कार्यालय से उसे विदाई की पार्टी दी जा रही है | अभी एक अधिकारी ने उसके सेवाकाल की प्रशंसा करते हुए यह जानने  की जिज्ञासा जताई है कि वह आगे क्या करना चाहता है |
     “मैं जिन्दगी से खुलकर बातें करना चाहता हूँ | सिर्फ बातें करना ही नहीं चाहता, जिन्दगी से अपनी बातें मनवाना भी चाहता हूँ | हाँ, मैं जीतना चाहता हूँ |” बस, इतना ही कह सका है वह और उसने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए हैं |०००