Sunday, 24 August 2014


     मेरा बयान    (मधुदीप की लघुकथा) 
वह कहता है कि मैं मर चुकी हूँ मगर मुझे पूरा विश्वास है कि मैं जिन्दा हूँ और अपने पूरे होशो-हवास में यह सब बयान कर रही हूँ | इस बात को लेकर हम दोनों के बीच रात ही अबोला खिंच गया था |
     अगर मैं मर चुकी होती तो इस समय आपसे रू-ब-रू कैसे होती ? क्या मरा हुआ व्यक्ति किसी से सम्वाद कर सकता है ? अगर मैं कहूँ कि मैं नहीं, वह मर चुका है, तो क्या वह इसे स्वीकार कर लेगा ?
     यह सच है कि गहराती रात में उन चार भेड़ियों ने मेरी देह नोची है मगर इससे मैं यह कैसे मान लूँ कि मैं मर चुकी हूँ ! मैं जिन्दा हूँ, यह सौ प्रतिशत सच है और इसका प्रमाण है कि मैं इस घटना की पूरी रपट थाने में लिखवाकर आई हूँ और सुबह फिर इस सन्दर्भ में मुझे पुलिस थाने जाना है |
     “तुम्हें क्या जरूरत थी पुलिस थाने जाने की और इस सब की रिपोर्ट लिखवाने की !” रात को सब-कुछ जानने के बाद उसकी यही प्रतिक्रिया थी |
     “तो क्या मुझे इसके बाद चुप बैठ जाना चाहिए था ?” मुझे लग रहा था कि मेरी पीठ पर एक कीड़ा रेंग रहा है | मैं हाथ पीछे कर उसे हटाना चाह रही थी मगर मेरा हाथ वहाँ तक पहुँच ही नहीं पा रहा था |
     “अब इससे कुछ हासिल होगा ?” एक प्रश्न उछला था उस ओर से |
     “क्यों नहीं...?”
     “इस घटना के बाद तुम मर चुकी हो और मुर्दों को कुछ हासिल नहीं हुआ करता |”
     “यह झूठ है, सरासर झूठ | मैं जिन्दा हूँ...सौ प्रतिशत ! और जिन्दा लोग लड़ाई से भागा नहीं करते |”
     उसके पास इसका शायद कोई जवाब नहीं था | वह मुँह फिराकर पसर गया था |

     मैं कुर्सी में धँसी अपने जिन्दा होने का प्रमाण ढूँढ रही हूँ क्योंकि उस प्रमाण के साथ मुझे सुबह होते ही पुलिस थाने जाना है |   ००० 

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