Wednesday, 20 August 2014

हाँ, मैं जीतना चाहता हूँ / मधुदीप

मधुदीप
‘आओ, जिन्दगी से कुछ बातें करें !’ हाँ, अनुपम खेर ने एक टीवी विज्ञापन में यही तो कहा था |
     वह भी पिछले साठ साल से अपनी जिन्दगी से बातें करता रहा है मगर जिन्दगी ने जैसे उसकी बातें कभी सुनी ही नहीं |
     उसने अपने बचपन से बातें की थीं | सफेद कमीज और पतलून पहनकर क्रिकेट का बल्ला घुमाने की बातें मगर जिन्दगी ने उसकी बातें सुनने की बजाय उसके पिता की बातें सुनीं और उसे फुटबाल का खिलाड़ी बना दिया | हासिल रहा शून्य |
     बचपन से युवावस्था आने तक वह अपनी जिन्दगी से फुसफुसाहटों में बातें करता रहा | यह जिन्दगी से सपनों की बातें करने का समय था | उसने जिन्दगी से प्राध्यापक बनने के सपने की बात की मगर यहाँ भी जिन्दगी ने उसकी बजाय नियति की बातें सुनी | पिता के अचानक अवसान के कारण वह भारत सरकार में एक अदना-सा लिपिक बनकर रह गया |
     उसके बाद अब तक वह जिन्दगी से बतियाने और उसे अपनी सुनाने का भरसक प्रयास करता रहा मगर जिन्दगी ने जिस अन्धी दौड़ में उसे धकेल दिया था उसमें उसे ठहरकर इत्मीनान से बातें करने का मौका ही नहीं मिला | घर,परिवार,बच्चे और उन सबका दायित्व...वह जिन्दगी से कब अपने मन की बात कह सका ! कब अपनी बात उससे मनवा सका ! वह बस हारता ही तो रहा |
     आज वह सेवा-निवृत्त हो रहा है | कार्यालय से उसे विदाई की पार्टी दी जा रही है | अभी एक अधिकारी ने उसके सेवाकाल की प्रशंसा करते हुए यह जानने  की जिज्ञासा जताई है कि वह आगे क्या करना चाहता है |
     “मैं जिन्दगी से खुलकर बातें करना चाहता हूँ | सिर्फ बातें करना ही नहीं चाहता, जिन्दगी से अपनी बातें मनवाना भी चाहता हूँ | हाँ, मैं जीतना चाहता हूँ |” बस, इतना ही कह सका है वह और उसने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए हैं |००० 

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