मधुदीप
Wednesday, 8 October 2014
Thursday, 2 October 2014
अबाउट टर्न (मधुदीप की लघुकथा)
अक्तूबर का अन्त है . शहर पर गुलाबी ठण्ड
पसरने लगी है . सुबह के नौ बज चुके हैं . पार्क में सुबह घूमने आनेवालों की भीड़
छँट चुकी है .
रामप्रसादजी एक बेंच पर गुमसुम बेठे हैं .
उनके सभी साथी जा चुके हैं मगर उनका मन घर जाने का नहीं है . घर पर कौन उनकी
प्रतीक्षा कर रहा है ! दो वर्ष पहले जब वे सेवामुक्त हुए तो कैंसर से पीड़ित उनकी
पत्नी भी साथ छोड़ गई .बेटा है, बहू है मगर वे दोनों नौकरी पर चले जाते हैं. वे
सारा दिन अपनी ‘स्टडी’ में किताबों में गुम बैठे रहते हैं .
‘ ढम...ढम...’ सामने मिलट्री ग्राउंड में हो
रही सैनिकों की परेड में बज रही ड्रम की आवाज उनके सिर पर हथौड़े की तरह बज उठती है
.
“बात मदद करने की नहीं है, बल्कि सच यह है
कि आप हमारा अधिकार उस महरी को देना चाहते हैं ...” बेटा यहीं पर नहीं रुका था, “
आप महरी से जुड़ते जा रहे हैं ,,,”
आगे कुछ नहीं सुन सके थे वे, सन्न रह गए थे
.
बात कुछ भी नहीं थी मगर तूल पकड़ती चली गई थी
. वे घर की महरी की लड़की की शादी में कुछ आर्थिक मदद करना चाह रहे थे मगर बेटे की
नजर में उन्हें इसका कोई अधिकार नहीं था . वे समझ नहीं पाए थे कि उनका बेटा
उनपर ऐसा घटिया लांछन क्यों और कैसे लगा
गया ! क्या उन्हें खुद की कमाई इस दौलत में से अपनी मर्जी से कुछ भी खर्च करने का
अधिकार नहीं है ?
सूरज थोड़ा और ऊपर आ गया है . तपिश भी बढ़ने
लगी है .
‘अबाउट टर्न...’ सामने मिलट्री ग्राउंड में
सेनानायक की तेज आवाज गूँज उठी है .
वे उठे और उनके पाँव पार्क से निकलकर ‘अनुभव
घर’ वृद्धाश्रम की ओर मुड़ गये . 000
Thursday, 25 September 2014
छोटा, बहुत छोटा (मधुदीप की लघुकथा)
छोटा, बहुत छोटा (मधुदीप की लघुकथा)
एक सम्भ्रान्त-सी कॉलोनी में बनी रामनिवास
मिश्र की छोटी-सी कोठी का आज गृह-प्रवेश है |
रामनिवास मिश्र ने गरीब परिवार में जन्म अवश्य लिया था मगर उसमें उससे सतत
संघर्ष का माद्दा भी था | दसवीं की परीक्षा पास करते ही उसने कारखाने में काम करना
शुरू कर दिया था ताकि शाम के कॉलिज में अपनी पढाई जारी रख सके | जिस दिन वह भारत
सरकार के एक कार्यालय में तृतीय श्रेणी का लिपिक बनकर पहुँचा, उसका सिर ऊँचा था |
अपने छत्तीस साल के सेवाकाल में वह लिपिक से अनुभाग अधिकारी के पद तक तो
अवश्य पहुँच गया था मगर एक कसक हमेशा उसके मन में बनी रही थी | काश ! वह ढंग की
कॉलोनी में अपना एक छोटा-सा आशियाना बना सके | जिस निम्न मध्यम वर्ग इलाके में
उसका ठिकाना था, उससे वह कभी सन्तुष्ट नहीं रहा | इसे उसका भाग्य ही कहें, उसे
अपने सेवाकाल में ही एक सौ बीस मीटर जमीन का टुकड़ा नगर विकास प्राधिकरण के ड्रा
में मिल गया था | बस, सेवानिवृत्त होते ही मिले पैसे से उसने उस पर अपने सपनों का
महल बना लिया |
आज गर्व और सन्तोष से रामनिवास मिश्र की गर्दन थोड़ी ऊँची है | गृह-प्रवेश
के समारोह में उसने अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ ही आस-पड़ोस से सभी को बुलाया है |
दोपहर ढल रही है...दो बज रहे हैं | शामियाने में गहमागहमी है |
“मिश्राजी, आपने कोठी में कार पार्किंग नहीं बनवाई ?” पड़ोसी सहगल साहब ने
लिफाफा देते हुए कोल्ड ड्रिंक का गिलास हाथ में थाम लिया |
“सहगल भाई, जब अपने पास कार ही नहीं है तो फिर कार पार्किंग का क्या करना
है !” मिश्र ने सहजता से कहा |
“क्या...?” सहगल साहब चौंके तो उनके हाथ की कोल्ड ड्रिंक मिश्र के कपड़ों पर
छलक गई |
मिश्र को महसूस हो रहा है, वह छोटा, बहुत छोटा हो गया है | ०००
विषपायी (मधुदीप की लघुकथा)
विषपायी (मधुदीप
की लघुकथा)
बात उन दिनों की है जब ‘लव जिहाद’ शब्द
पूरी तीव्रता से देश की हवाओं में फैल रहा था | हाँ, यह बात और है कि देश का
गृहमन्त्री इस शब्द से बिलकुल अनभिज्ञ था |
रामचन्द्र शर्मा के घर की बैठक में उनका पूरा परिवार एकत्रित था | आसन्न
संकट से वहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था | निखिल और जुबैदा सब के सामने सिर झुकाए बैठे
थे |
“मैं निखिल को दिल की गहराइयों से प्यार करती हूँ |” जुबैदा की जुबान खुली
तो सन्नाटा और अधिक गहरा गया |
“मैं जानता हूँ ,बेटी !” रामचन्द्र की निगाहें खिड़की से बाहर झाँक रही थीं
|
“मैं इसके लिए अपना धर्म भी बदलने को तैयार हूँ |” जुबैदा के शब्दों में
थोड़ी मजबूती थी |
“हिन्दू धर्म इसकी इजाजत ही नहीं देता, बेटी !” रामचन्द की आवाज बुझी हुई
थी |
“तो मैं अपना धर्म बदल लेता हूँ |” निखिल की आवाज पर सब की निगाहें उधर ही
खिंच गई थीं |
“नहीं निखिल, यह नहीं हो सकता |” जुबैदा प्रतिवाद कर उठी |
“क्यों नहीं हो सकता ?” निखिल ने प्रश्न उठाया |
“धर्म के ठेकेदारों के लिए तो यह ‘लव जिहाद’ होगा ना, चाहे दूसरी तरह का ही
क्यों न हो |”
जुबैदा के शब्दों की दृढता ने रामचन्द्र के साथ ही वहाँ उपस्थित सभी को
चौंका दिया |
“तो फिर...?” रामचन्द्र और निखिल दोनों की प्रश्नभरी दृष्टि एक साथ जुबैदा
के चेहरे पर टिक गईं |
थोड़ी देर तक चुप्पी छाई रही | प्रश्न यूँ ही हवा में टँगा रहा |
“हमें थोड़ा इन्तजार करना होगा, निखिल |”
“कब तक...?”
“इस जहरभरी आँधी के उतरने तक...ठण्डी बयार के आने तक |”
“क्या यह कभी होगा ?...क्या इस जहर को पीने के लिए कोई नीलकण्ठ आयेगा ?”
निखिल की दृष्टि सामने की दीवार पर लगे कैलेण्डर पर टिक गई थी |
“नहीं निखिल, कोई नीलकण्ठ नहीं आयेगा | हमें
खुद ही अपना नीलकण्ठ बनना होगा | हमें खुद ही यह जहर पीना होगा | न केवल पीना
होगा, पचाना भी होगा | विश्वास रखो, यह जहर ही हमारे लिए अमृत बनेगा |”
कहकर जुबैदा तेजी से उठी और मजबूत कदमों से दरवाजे से बाहर निकल गई |
रामचन्द्र और निखिल दोनों की निगाहें उसकी पीठ से चिपककर रह गई थीं | ०००
Wednesday, 27 August 2014
ठक-ठक...ठक-ठक
(मधुदीप की लघुकथा)
जेठ की तपती सुबह है | अभी दस ही बजे हैं
मगर लूएँ चल रही हैं | भुवनेश्वर दत्त झुंझला रहे हैं, ‘इतना समय भी नहीं मिल पाता
कि कार का एयर-कंडीशन ही ठीक करवा लें |
भागदौड़...दौडभाग... भागदौड़... प्रकाशन का भी यह कैसा व्यवसाय है कि इतनी
भागदौड़ के बाद भी ठीक-सा जुगाड़ नहीं हो पाता |’
लालबत्ती पर कार रुक गई है | भुवनेश्वर
दत्त की झुंझलाहट और बढ़ रही है | यह लाल बत्ती... उफ...कितनी लम्बी...तीन मिनट
की...वे बेचैन हो उठे हैं |
“बाबूजी ! बाल पैन...दस रुपये के चार...लेलो बाबूजी...”फटी फ्राक पहने,
एक दस
साल की बच्ची कार की खुली खिड़की पर ठक-ठक कर रही है |
“क्या करूँगा इनका...!” वे मुँह दूसरी तरफ घुमा लेते हैं |
“लेलो बाबूजी...रोटी खा लूँगी...भूख लगी है...” खिड़की पर ठक-ठक बढ़ रही है |
“ओह ! भीख माँगने का नया तरीका...!” वे व्यंग्य से मुस्कराते हैं | हरी
बत्ती होते ही कार आगे बढ़ जाती है |
मुस्कराहट में भुवनेश्वर दत्त की झुंझलाहट डूब गई तो उन्होंने कार की स्पीड
बढ़ा दी, ‘साढ़े दस बज रहे हैं...सिन्हा साहब ने तो दस बजे ही मिलने को कहा
था...कहीं निकल न जायें ... आज उनसे बात पक्की कर ही लेनी है...चाहे कुछ भी
माँगें...इस बार भरपूर आदेश चाहिए उन्हें...’
कार चीं...की आवाज के साथ सिन्हा साहब की कोठी के सामने रुकी | सिन्हा साहब बाहर लॉन में ही कुर्सी पर बैठे
अखबार पढ़ रहे थे | देखकर भुवनेश्वर दत्त को तसल्ली हुई |
“सिन्हा साहब, नमस्कार !”
उत्तर में सिन्हा साहब ने अखबार सामने रखी मेज पर दिया तथा उँगली से
भुवनेश्वर दत्त को पास पड़ी कुर्सी पर बैठने का संकेत किया |
“सर ! इस बार आपकी विशेष कृपा चाहिए |” चुप्पी को तोड़ते हुए भुवनेश्वर दत्त
ने कहा |
सिन्हा साहब की प्रश्नभरी दृष्टि उनकी ओर उठी |
“सर ! इस बार बिटिया की शादी तय हो गई है |”
“बहुत खूब भुवनेश्वरजी ! सब यही कह रहे
हैं...क्या यह कोई नया तरीका है...?”
सुनकर भुवनेश्वर दत्त सन्न रह गए हैं |
ठक-ठक...ठक-ठक...कार लालबत्ती पर खड़ी है...खिड़की पर लगातार ठक-ठक हो रही है
| ०००
---- मधुदीप
138/16 त्रिनगर , दिल्ली—110 035,
मोबायल
: 093124 00709, 081300 70928
Sunday, 24 August 2014
मेरा बयान (मधुदीप की लघुकथा)
वह कहता है कि मैं मर चुकी हूँ मगर मुझे
पूरा विश्वास है कि मैं जिन्दा हूँ और अपने पूरे होशो-हवास में यह सब बयान कर रही
हूँ | इस बात को लेकर हम दोनों के बीच रात ही अबोला खिंच गया था |
अगर मैं मर चुकी होती तो इस समय आपसे रू-ब-रू कैसे होती ? क्या मरा हुआ
व्यक्ति किसी से सम्वाद कर सकता है ? अगर मैं कहूँ कि मैं नहीं, वह मर चुका है, तो
क्या वह इसे स्वीकार कर लेगा ?
यह सच है कि गहराती रात में उन चार भेड़ियों ने मेरी देह नोची है मगर इससे
मैं यह कैसे मान लूँ कि मैं मर चुकी हूँ ! मैं जिन्दा हूँ, यह सौ प्रतिशत सच है और
इसका प्रमाण है कि मैं इस घटना की पूरी रपट थाने में लिखवाकर आई हूँ और सुबह फिर
इस सन्दर्भ में मुझे पुलिस थाने जाना है |
“तुम्हें क्या जरूरत थी पुलिस थाने जाने की और इस सब की रिपोर्ट लिखवाने की
!” रात को सब-कुछ जानने के बाद उसकी यही प्रतिक्रिया थी |
“तो क्या मुझे इसके बाद चुप बैठ जाना चाहिए था ?” मुझे लग रहा था कि मेरी
पीठ पर एक कीड़ा रेंग रहा है | मैं हाथ पीछे कर उसे हटाना चाह रही थी मगर मेरा हाथ
वहाँ तक पहुँच ही नहीं पा रहा था |
“अब इससे कुछ हासिल होगा ?” एक प्रश्न उछला था उस ओर से |
“क्यों नहीं...?”
“इस घटना के बाद तुम मर चुकी हो और मुर्दों को कुछ हासिल नहीं हुआ करता |”
“यह झूठ है, सरासर झूठ | मैं जिन्दा हूँ...सौ प्रतिशत ! और जिन्दा लोग लड़ाई
से भागा नहीं करते |”
उसके पास इसका शायद कोई जवाब नहीं था | वह मुँह फिराकर पसर गया था |
मैं कुर्सी में धँसी अपने जिन्दा होने का प्रमाण ढूँढ रही हूँ क्योंकि उस
प्रमाण के साथ मुझे सुबह होते ही पुलिस थाने जाना है | ०००
Wednesday, 20 August 2014
हाँ, मैं जीतना चाहता हूँ / मधुदीप
| मधुदीप |
‘आओ, जिन्दगी से कुछ बातें करें !’ हाँ,
अनुपम खेर ने एक टीवी विज्ञापन में यही तो कहा था |
वह भी पिछले साठ साल से अपनी जिन्दगी से बातें करता रहा है मगर जिन्दगी ने
जैसे उसकी बातें कभी सुनी ही नहीं |
उसने अपने बचपन से बातें की थीं | सफेद कमीज और पतलून पहनकर क्रिकेट का
बल्ला घुमाने की बातें मगर जिन्दगी ने उसकी बातें सुनने की बजाय उसके पिता की
बातें सुनीं और उसे फुटबाल का खिलाड़ी बना दिया | हासिल रहा शून्य |
बचपन से युवावस्था आने तक वह अपनी जिन्दगी से फुसफुसाहटों में बातें करता
रहा | यह जिन्दगी से सपनों की बातें करने का समय था | उसने जिन्दगी से प्राध्यापक
बनने के सपने की बात की मगर यहाँ भी जिन्दगी ने उसकी बजाय नियति की बातें सुनी |
पिता के अचानक अवसान के कारण वह भारत सरकार में एक अदना-सा लिपिक बनकर रह गया |
उसके बाद अब तक वह जिन्दगी से बतियाने और उसे अपनी सुनाने का भरसक प्रयास
करता रहा मगर जिन्दगी ने जिस अन्धी दौड़ में उसे धकेल दिया था उसमें उसे ठहरकर इत्मीनान
से बातें करने का मौका ही नहीं मिला | घर,परिवार,बच्चे और उन सबका दायित्व...वह
जिन्दगी से कब अपने मन की बात कह सका ! कब अपनी बात उससे मनवा सका ! वह बस हारता
ही तो रहा |
आज वह सेवा-निवृत्त हो रहा है | कार्यालय से उसे विदाई की पार्टी दी जा रही
है | अभी एक अधिकारी ने उसके सेवाकाल की प्रशंसा करते हुए यह जानने की जिज्ञासा जताई है कि वह आगे क्या करना चाहता
है |
“मैं जिन्दगी से खुलकर बातें करना चाहता हूँ
| सिर्फ बातें करना ही नहीं चाहता, जिन्दगी से अपनी बातें मनवाना भी चाहता हूँ |
हाँ, मैं जीतना चाहता हूँ |” बस, इतना ही कह सका है वह और उसने अपने दोनों हाथ जोड़
दिए हैं |०००
Subscribe to:
Posts (Atom)
