Thursday, 2 October 2014

                         अबाउट टर्न  (मधुदीप की लघुकथा)

     अक्तूबर का अन्त है . शहर पर गुलाबी ठण्ड पसरने लगी है . सुबह के नौ बज चुके हैं . पार्क में सुबह घूमने आनेवालों की भीड़ छँट चुकी है .
     रामप्रसादजी एक बेंच पर गुमसुम बेठे हैं . उनके सभी साथी जा चुके हैं मगर उनका मन घर जाने का नहीं है . घर पर कौन उनकी प्रतीक्षा कर रहा है ! दो वर्ष पहले जब वे सेवामुक्त हुए तो कैंसर से पीड़ित उनकी पत्नी भी साथ छोड़ गई .बेटा है, बहू है मगर वे दोनों नौकरी पर चले जाते हैं. वे सारा दिन अपनी ‘स्टडी’ में किताबों में गुम बैठे रहते हैं .
    ‘ ढम...ढम...’ सामने मिलट्री ग्राउंड में हो रही सैनिकों की परेड में बज रही ड्रम की आवाज उनके सिर पर हथौड़े की तरह बज उठती है .
     “बात मदद करने की नहीं है, बल्कि सच यह है कि आप हमारा अधिकार उस महरी को देना चाहते हैं ...” बेटा यहीं पर नहीं रुका था, “ आप महरी से जुड़ते जा रहे हैं ,,,”
     आगे कुछ नहीं सुन सके थे वे, सन्न रह गए थे .
     बात कुछ भी नहीं थी मगर तूल पकड़ती चली गई थी . वे घर की महरी की लड़की की शादी में कुछ आर्थिक मदद करना चाह रहे थे मगर बेटे की नजर में उन्हें इसका कोई अधिकार नहीं था . वे समझ नहीं पाए थे कि उनका बेटा उनपर  ऐसा घटिया लांछन क्यों और कैसे लगा गया ! क्या उन्हें खुद की कमाई इस दौलत में से अपनी मर्जी से कुछ भी खर्च करने का अधिकार नहीं है ?
     सूरज थोड़ा और ऊपर आ गया है . तपिश भी बढ़ने लगी है .
     ‘अबाउट टर्न...’ सामने मिलट्री ग्राउंड में सेनानायक की तेज आवाज गूँज उठी है .
     वे उठे और उनके पाँव पार्क से निकलकर ‘अनुभव घर’ वृद्धाश्रम की ओर मुड़ गये . 000


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