ठक-ठक...ठक-ठक
(मधुदीप की लघुकथा)
जेठ की तपती सुबह है | अभी दस ही बजे हैं
मगर लूएँ चल रही हैं | भुवनेश्वर दत्त झुंझला रहे हैं, ‘इतना समय भी नहीं मिल पाता
कि कार का एयर-कंडीशन ही ठीक करवा लें |
भागदौड़...दौडभाग... भागदौड़... प्रकाशन का भी यह कैसा व्यवसाय है कि इतनी
भागदौड़ के बाद भी ठीक-सा जुगाड़ नहीं हो पाता |’
लालबत्ती पर कार रुक गई है | भुवनेश्वर
दत्त की झुंझलाहट और बढ़ रही है | यह लाल बत्ती... उफ...कितनी लम्बी...तीन मिनट
की...वे बेचैन हो उठे हैं |
“बाबूजी ! बाल पैन...दस रुपये के चार...लेलो बाबूजी...”फटी फ्राक पहने,
एक दस
साल की बच्ची कार की खुली खिड़की पर ठक-ठक कर रही है |
“क्या करूँगा इनका...!” वे मुँह दूसरी तरफ घुमा लेते हैं |
“लेलो बाबूजी...रोटी खा लूँगी...भूख लगी है...” खिड़की पर ठक-ठक बढ़ रही है |
“ओह ! भीख माँगने का नया तरीका...!” वे व्यंग्य से मुस्कराते हैं | हरी
बत्ती होते ही कार आगे बढ़ जाती है |
मुस्कराहट में भुवनेश्वर दत्त की झुंझलाहट डूब गई तो उन्होंने कार की स्पीड
बढ़ा दी, ‘साढ़े दस बज रहे हैं...सिन्हा साहब ने तो दस बजे ही मिलने को कहा
था...कहीं निकल न जायें ... आज उनसे बात पक्की कर ही लेनी है...चाहे कुछ भी
माँगें...इस बार भरपूर आदेश चाहिए उन्हें...’
कार चीं...की आवाज के साथ सिन्हा साहब की कोठी के सामने रुकी | सिन्हा साहब बाहर लॉन में ही कुर्सी पर बैठे
अखबार पढ़ रहे थे | देखकर भुवनेश्वर दत्त को तसल्ली हुई |
“सिन्हा साहब, नमस्कार !”
उत्तर में सिन्हा साहब ने अखबार सामने रखी मेज पर दिया तथा उँगली से
भुवनेश्वर दत्त को पास पड़ी कुर्सी पर बैठने का संकेत किया |
“सर ! इस बार आपकी विशेष कृपा चाहिए |” चुप्पी को तोड़ते हुए भुवनेश्वर दत्त
ने कहा |
सिन्हा साहब की प्रश्नभरी दृष्टि उनकी ओर उठी |
“सर ! इस बार बिटिया की शादी तय हो गई है |”
“बहुत खूब भुवनेश्वरजी ! सब यही कह रहे
हैं...क्या यह कोई नया तरीका है...?”
सुनकर भुवनेश्वर दत्त सन्न रह गए हैं |
ठक-ठक...ठक-ठक...कार लालबत्ती पर खड़ी है...खिड़की पर लगातार ठक-ठक हो रही है
| ०००
---- मधुदीप
138/16 त्रिनगर , दिल्ली—110 035,
मोबायल
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