Thursday, 25 September 2014

विषपायी (मधुदीप की लघुकथा)

       विषपायी    (मधुदीप की लघुकथा)
बात उन दिनों की है जब ‘लव जिहाद’ शब्द पूरी तीव्रता से देश की हवाओं में फैल रहा था | हाँ, यह बात और है कि देश का गृहमन्त्री इस शब्द से बिलकुल अनभिज्ञ था |
     रामचन्द्र शर्मा के घर की बैठक में उनका पूरा परिवार एकत्रित था | आसन्न संकट से वहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था | निखिल और जुबैदा सब के सामने सिर झुकाए बैठे थे |
     “मैं निखिल को दिल की गहराइयों से प्यार करती हूँ |” जुबैदा की जुबान खुली तो सन्नाटा और अधिक गहरा गया |
     “मैं जानता हूँ ,बेटी !” रामचन्द्र की निगाहें खिड़की से बाहर झाँक रही थीं |
     “मैं इसके लिए अपना धर्म भी बदलने को तैयार हूँ |” जुबैदा के शब्दों में थोड़ी मजबूती थी |
     “हिन्दू धर्म इसकी इजाजत ही नहीं देता, बेटी !” रामचन्द की आवाज बुझी हुई थी |
     “तो मैं अपना धर्म बदल लेता हूँ |” निखिल की आवाज पर सब की निगाहें उधर ही खिंच गई थीं |
     “नहीं निखिल, यह नहीं हो सकता |” जुबैदा प्रतिवाद कर उठी |
     “क्यों नहीं हो सकता ?” निखिल ने प्रश्न उठाया |
     “धर्म के ठेकेदारों के लिए तो यह ‘लव जिहाद’ होगा ना, चाहे दूसरी तरह का ही क्यों न हो |”
     जुबैदा के शब्दों की दृढता ने रामचन्द्र के साथ ही वहाँ उपस्थित सभी को चौंका दिया |
     “तो फिर...?” रामचन्द्र और निखिल दोनों की प्रश्नभरी दृष्टि एक साथ जुबैदा के चेहरे पर टिक गईं |
      थोड़ी देर तक चुप्पी छाई रही | प्रश्न यूँ ही हवा में टँगा रहा |
     “हमें थोड़ा इन्तजार करना होगा, निखिल |”
     “कब तक...?”
     “इस जहरभरी आँधी के उतरने तक...ठण्डी बयार के आने तक |”
     “क्या यह कभी होगा ?...क्या इस जहर को पीने के लिए कोई नीलकण्ठ आयेगा ?” निखिल की दृष्टि सामने की दीवार पर लगे कैलेण्डर पर टिक गई थी |
     “नहीं निखिल, कोई नीलकण्ठ नहीं आयेगा | हमें खुद ही अपना नीलकण्ठ बनना होगा | हमें खुद ही यह जहर पीना होगा | न केवल पीना होगा, पचाना भी होगा | विश्वास रखो, यह जहर ही हमारे लिए अमृत बनेगा |”
     कहकर जुबैदा तेजी से उठी और मजबूत कदमों से दरवाजे से बाहर निकल गई | रामचन्द्र और निखिल दोनों की निगाहें उसकी पीठ से चिपककर रह गई थीं |   ०००
    
   

    

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