विषपायी (मधुदीप
की लघुकथा)
बात उन दिनों की है जब ‘लव जिहाद’ शब्द
पूरी तीव्रता से देश की हवाओं में फैल रहा था | हाँ, यह बात और है कि देश का
गृहमन्त्री इस शब्द से बिलकुल अनभिज्ञ था |
रामचन्द्र शर्मा के घर की बैठक में उनका पूरा परिवार एकत्रित था | आसन्न
संकट से वहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था | निखिल और जुबैदा सब के सामने सिर झुकाए बैठे
थे |
“मैं निखिल को दिल की गहराइयों से प्यार करती हूँ |” जुबैदा की जुबान खुली
तो सन्नाटा और अधिक गहरा गया |
“मैं जानता हूँ ,बेटी !” रामचन्द्र की निगाहें खिड़की से बाहर झाँक रही थीं
|
“मैं इसके लिए अपना धर्म भी बदलने को तैयार हूँ |” जुबैदा के शब्दों में
थोड़ी मजबूती थी |
“हिन्दू धर्म इसकी इजाजत ही नहीं देता, बेटी !” रामचन्द की आवाज बुझी हुई
थी |
“तो मैं अपना धर्म बदल लेता हूँ |” निखिल की आवाज पर सब की निगाहें उधर ही
खिंच गई थीं |
“नहीं निखिल, यह नहीं हो सकता |” जुबैदा प्रतिवाद कर उठी |
“क्यों नहीं हो सकता ?” निखिल ने प्रश्न उठाया |
“धर्म के ठेकेदारों के लिए तो यह ‘लव जिहाद’ होगा ना, चाहे दूसरी तरह का ही
क्यों न हो |”
जुबैदा के शब्दों की दृढता ने रामचन्द्र के साथ ही वहाँ उपस्थित सभी को
चौंका दिया |
“तो फिर...?” रामचन्द्र और निखिल दोनों की प्रश्नभरी दृष्टि एक साथ जुबैदा
के चेहरे पर टिक गईं |
थोड़ी देर तक चुप्पी छाई रही | प्रश्न यूँ ही हवा में टँगा रहा |
“हमें थोड़ा इन्तजार करना होगा, निखिल |”
“कब तक...?”
“इस जहरभरी आँधी के उतरने तक...ठण्डी बयार के आने तक |”
“क्या यह कभी होगा ?...क्या इस जहर को पीने के लिए कोई नीलकण्ठ आयेगा ?”
निखिल की दृष्टि सामने की दीवार पर लगे कैलेण्डर पर टिक गई थी |
“नहीं निखिल, कोई नीलकण्ठ नहीं आयेगा | हमें
खुद ही अपना नीलकण्ठ बनना होगा | हमें खुद ही यह जहर पीना होगा | न केवल पीना
होगा, पचाना भी होगा | विश्वास रखो, यह जहर ही हमारे लिए अमृत बनेगा |”
कहकर जुबैदा तेजी से उठी और मजबूत कदमों से दरवाजे से बाहर निकल गई |
रामचन्द्र और निखिल दोनों की निगाहें उसकी पीठ से चिपककर रह गई थीं | ०००
No comments:
Post a Comment